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गुलाबो का प्यार

लगातार सात दिन चले, बाबा वैलेंटाइन का त्यौहार इस बार भी ख़तम हो गया. गुलाब की आशा पाले ठलवे अपने पैरों में काँटों का दर्द लिए दारु और चखने के साथ वापिस बैक टू पबिलियन हो चुके हैं.  कईयों का मानना है कि मोदी जी के 'बेटी पढाओ, बेटी बचाओ' आन्दोलन को उनके होने वाले सास ससुर ने गंभीरता पूर्वक नहीं लिया नहीं तो उनको ये दिन देखना नहीं पड़ता . उनके साथ भी उनकी गुलाबो होती.

खैर गुलाबो तो मिली पर फिल्म 'मटरू की बिजली का मनडोला' में जो पंकज कपूर को मिली थी, वो वाली .  गुलाबो के नशे में चूर भैया के पाँव तो लडखडा रहे थे लेकिन आवाज़ में उतना ही जोश था , हौसले अब भी बुलंद थे . यकीन  मानिये,  भारत सरकार भैया को अगर बॉर्डर पर भेज देते तो बार्डर पार के लोगों का पैंट गीला कर आते.

Gulabo Ka Pyar 

ऐसी बात नहीं है कि भैया दौड़ नहीं लगाए थे . मैट्रिक की परीक्षा पास करते ही भैया भोरे-भोरे नद्दी किनारे रोजीना तीन चक्कर मारते थे जैसे गणेश जी अपने पप्पा-मम्मी का चक्कर लगाये थे .  खूब पसीना बहाए लेकिन  उसी के साथ उनका नौकरी पाने का लक भी बह गया. लेट लतीफे वाली सरकारी रवैये में भैया ना ही बन पाए फौजी, और ना ही मिली भौजी .

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यही चिंता भैया को खाए जा रही थी . निवारण हेतु भैया,  नसीब देखने वाले डॉक्टर के पास सब समर्पित कर पहुंचे और ये आश्वासन के साथ लौटे थे की अबकी बार 2020 में कुछ भी उन्नीस नहीं रहेगा . भैया को 2020 से बड़ी आशा थी लेकिन बीस ने ऐसी बीसी (BC) की, कि उनके शरीर का सारा कल-पूर्जा हिल गया  . भैया इस ठण्ड भी अकड़ के सिकुड़कर रह गए थे .

रात गहरी हो रही थी . प्यार में इंतहा की हद तक टूट चुके भैया का एक ही सहारा गुलाबो थी और साथ ही उनका चोटीला तजुर्बा . गुलाबो की रंगीनियत में भैया अपने दर्द को मालबोरो के धुएं के साथ भर भर कर छोड़ते हुए  कह रहे थे  'इश्क जब एक तरफ हो तो सजा देता है'. फ़ौरन हमने भी चुटीले अंदाज़ में पूछ ही लिया, भैया ! ये वही है न जिससे आप व्हाट्सएप पर चैटियाते थे. फिर क्या, बिना देरी किये भैया जी एक और ज्ञान पेल दिए :

" फरेबी , मक्कारी फिजाओं में है |
दोस्त होता नहीं हर प्यार से बतियाने वाला ||" 

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भैया के इस बात ने झटके में दुनिया की सैर करवा दी. अतीत , वर्तमान , भविष्य सब एकसाथ खड़े नज़र आ रहे थे . सपने से छूटे तो देखा , भैया गुलाबो को पकड़ सोफे पर एक तरफ टिक गए थे . उनका और गुलाबो का प्यार अपने चरम पर था . ज्ञान गंगा का अनवरत प्रवाह जारी था . प्यार , धोखा , बेवफाई पर दिए भैया के प्रवचन में आज अगर दीपक चोपड़ा या विवेक बिंद्रा भी होते तो भैया को शास्टांग दंडवत दे देते . हमरा भी ज्ञान का टैंकर फुल हो रहा था.  जैसे तैसे जाने की इज़ाज़त मांगी, भैया जी सोफे पर खुद को सँभालते हुए बोले :

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा 
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा  (-बशीर बद्र ) 

चाहे जो भी हो, हम इतना तो ज़रूर समझ गए कि भैया को इस वैलेंटाइन भी भौजी तो नहीं मिली पर हौसला कम नहीं हुआ था . और प्यार भी कभी ख़त्म होता है क्या ? प्यार तो एक इंटेंसिव इनर्जी है जो कभी ख़त्म नहीं होता ; इसका रूपांतरण होता है . 

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