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भारतीय कृषि : समस्या और समाधान

An essay on the 'Problems and Solution of Indian Agriculture'
"भारत एक कृषि प्रधान देश है "  अक्सर कृषि लेखों (Essays on Agriculture) की शुरुआत इसी वाक्य से होती है. ग्रंथों में कहा गया है  'अन्नम वै प्राणिनां प्राणः ' ( अन्न प्राणियों का जीवन है अर्थात प्राण है।  प्राण ही जीवन एवं जीवन ही प्राण होता है।  प्राण नहीं तो जीवन नहीं। ) और हमसब इस तथ्य से भली भांति परिचित हैं। अन्न को उगाने की कला का नाम ही कृषि है. कृषि एक विज्ञान है जिसमे फसल को उगाने से लेकर उसके बाज़ारीकरण तक का सूक्ष्म ज्ञान निहित है. इसी विज्ञानं को जानने, समझने और उसके व्यवहारिक प्रयोग का अनवरत साधना का काम करने वाले किसान कहलाते हैं।   रोज़मर्रे की झंझावातों के साथ प्राकृतिक आपदाओं-विपदाओं से दो हाथ कर हमारे लिए दो वक़्त के निवाले का जुगाड़ करने वाले ये किसान हमारे समाज का अतिमहत्वपूर्ण अंग है।  यूँ कहे की, हमारे जीवन की प्राणवायु शक्ति को चलायमान रखने के एक महत्वपूर्ण कारक को निष्ठापूर्वक पालन करनेवाले ये किसान है. 
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कृषि का प्रारम्भ :
कृषि का आरम्भ परमात्मा से मिले वेदों के ज्ञान से हुआ और वेदों के आधार पर ही हमारे पूर्वजों ने खेती-किसानी कर कृषि-विषयक ज्ञान और अनुभवों को बढ़ाते हुए प्रगति करते रहे।  हिन्दू सभ्यता जो एक सर्वांगसम सभ्यता का पर्याय है, में हमारी कृषि व्यवस्था महत्वपूर्ण अंगों में से एक है और इसी वजह से हम सुजलाम सुफलाम जैसे शब्दों से इसे परिभाषित भी करते है.
ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनी भोजपुरी फिल्म मेहँदी लगा के रखना यहां देखें।  

हिन्दू सभ्यता के दो महत्वपूर्ण काव्य 'रमायण और 'महाभरात'  में भी कृषि का उल्लेख मिलता है. रामायण में राजा जनक को अपने खेतो में हल जोतते हुये धरती में से सीता जी मिली थी जिसका उन्होंने बड़े ही लाड-प्यार से पालन किया. महाभारत में हम जानते हैं की श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी को हल चलाने का बड़ा ही शौक था और तो और यह हल ही उनका आयुध था।

 प्राचीन ग्रंथों में पराशर मुनि द्वारा लिखित 'कृषि पराशर' , 'कृषि तंत्र ' और 'पराशर तंत्र 'आज भी सान्दर्भिक हैं जिसमे कृषि पर नक्षत्रों के प्रभाव, कृषि के देख भाल,  मेघ और उसकी जातियाँ, वर्षामाप, वर्षा का अनुमान, विभिन्न समयों की वर्षा का प्रभाव,  बैलों की सुरक्षा, गोपर्व, गोबर की खाद, हल, जोताई, बैलों के चुनाव, कटाई के समय, रोपण, धान्य संग्रह आदि विषयों की जानकारी मिलती है। 

आज के दौर में भारतीय कृषि और किसान  की समस्याएं 
 किसानो की समस्या अशिक्षा से शुरू होती है।  जेब में कलम , कंधे पे फावड़ा लिए एक भारतीय किसान।  
 आज भी  पूर्वी भारत (बिहार, पश्चिम बंगाल , उड़ीसा, झारखन्ड ) , उत्तरी भारत (ऊ० प्र०, दिल्ली, उत्तरा खंड, हरियाणा   इत्यादि  ) , मध्य भारत (छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, म० प्र०  ) के अधिकांश  किसानो की खेती-किसानी का आधार यह ग्रन्थ है। समय के साथ नए नए  अविष्कारों ने कृषि का स्तर ऊँचा किया जिससे फसलों की उत्पादक्ता एवं   किसानो की आय के आय में भी बढ़ोतरी की।  १९६०-७० के दशक में चले 'हरित  क्रांति अभियान ' ने  कई देशों मेक्सिको, भारत,  पाकिस्तान,फिलीपींस आदि-आदि ने  कृषि के क्षेत्र में क्रन्तिकारी पहल किया  जो आज भी  जारी है।  इस अभियान ने धान , गेहूं , मक्के के हाइब्रिड बीजों का चलन शुरू किया जिसने पैदावार के उत्पादन में बढ़ोतरी कर खाद्य संकट की चिंताजनक समस्या से हमें उबारा।  लेकिन इन  खाद्य पदार्थों की कालाबाज़ारी ने किसान व उपभोक्ताओं के बीच एक  लम्बी गहरी खाई बना दी जिससे दोनों बुरी तरह प्रभावित हुए।  एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार साल २०१८-१९ का 'मॅहगाई दर ' ४.५ % तक रहने की संभावना जताई है लेकिन इसी वर्ष जून के महीने में यह बढ़कर ५.७७ % हो गयी थी जो की चार वर्षों में सर्वाधिक है.

अंग्रेजी हुकूमत के समय कुछ ऐसे भारतीय ठग भी हुए जिन्होंने भारत में अंग्रेजी सत्ता को और भी मज़बूत करने का काम किया. अमिताभ बच्चन, आमिर खान  की नयी फिल्म 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान ' का ट्रेलर यहाँ देखें  . 
ऐसे में छोटे व मंझोले किसान ग्रामीण साहूकारों या ' माइक्रो फाइनेंस ' जो अब बैंक में परिणत हो चुकी है , के क़र्ज़ तले दब जाते हैं और अंततः अपनी जान गंवा देते हैं।  सरकारी  रिपोर्ट के अनुसार वर्ष २०१३ में ११, ७७२ किसानो ने आत्महत्या की जबकि यह बढ़कर वर्ष २०१४ में  12,360  हो गयी थी वहीँ साल २०१५ में इसकी संख्या १२, ६०२  तक पर कर गयी।  अगर इसे ग्राफिकली देखा जाय तो यह हर वर्ष बढ़ता ही जा रहा है।  सरकार   ने २०१६ , २०१७ का डाटा प्रकाशित नहीं किया है पर सन  २००४ में किसानों ने  सर्वाधिक आत्महत्या की थी जिसकी संख्या सरकारी रिपोर्ट में १८,२४१ है. यद्यपि की सरकार ने नीतियों पर नीतियां  बनाये पर इसके क्रियान्वयन में लचर-पचर होने से मामला बिगड़ता ही जा रहा है।
जीवन -मृत्यु पर लिखी एक मार्मिक कविता - मृत्यु 
जिस प्रकार हरेक क्षेत्रों में पारदर्शिता हेतु तकनिकी का सहारा लिया जाता है ठीक उसी प्रकार कृषि क्षेत्र में भी इसका भरपूर उपयोग करना पड़ेगा। और इस प्रक्रिया में सर्कार प्रगतिशील मालूम प्रतीत होती है जिसका नतीजा 'ई नैम' (eNAM) है।   ई-नैम एक ऑनलाइन पोर्टल है जिसमे किसान अपनी फसलों की खरीद बिक्री ऑनलाइन कर सके जहां बिचौलिया का कोई रोल नहीं है।  पर यह तभी संभव है जब किसान को तकनिकी रूप से ट्रेंड किया जाय जिसमे सर्कार निष्क्रिय दिखती है।  किसी भी कार्य की कुशलता का माध्यम है उसकी प्रारंभिक शिक्षा और उसका  सतत प्रयास।
ई नैम क्या है पूरा जानने के  लिए पढ़ें 

वर्तमान सरकार की नयी कृषि नीतियां 
भारत जैसे देशों में जिसकी आबादी का सत्तर प्रतिशत लोग कृषि से जुड़े हों भारत के जीडीपी में मात्र 17. २६ % (२०१६-१७ रिपोर्ट) की हिस्सेदारी है. इससे भी अहम् यह की उचित शिक्षा के अभाव में किसानो को उनकी मजूरी का उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।  सरकार देश में उन्नत कृषि हेतु   रेडियो और टीवी पर अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत करती है।  यहां तक की 'कृषि दर्शन ' नामक टीवी चैनल खास तौर पर खेती-किसानी पर ही केंद्रित है जिसमे नए बीज , खाद, फसल संरक्षण, मार्केटिंग आदि सभी कृषि विषयों पर चर्चाएं होती है जिससे भारतीय  किसान वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर खेती में अपना मुनाफा बढ़ा सके।
भरत शर्मा का नया भजन 'हमरो भी लेलो खबर डमरूवाले ' यहाँ सुने.  
वर्तमान सरकार ने भारत की आज़ादी की ७५वें वर्षगांठ (२०२२ ) पर किसानो की आय दुगुनी करने का लक्ष्य रखा है।  जिसे नीति आयोग ने ढांचागत रूप से तैयार किया है।  वर्तमान बिहार  सरकार  राज्य में डीबीटी लाने की तयारी में है जिसमे किसानो द्वारा खपत की गयी बिजली, खाद, बीज आदि पर लगे लागत को सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर किया जायेगा और अभीतक मिल रहे सरकारी कृषि अनुदानों जिसका उपयोग किसानो से ज़्यादा गैर-किसान करते आ रहे है , पर विराम लगाया जायेगा।  इस प्रकार कृषि राजस्व में वृद्धि होगी जिसे केवल किसानो , कृषि तकनीकियों व कृषि क्षेत्र में रिसर्च और डेवलपमेंट पर उन पैसों का खर्च किया जायेगा।  खासकर मौजूदा समय में कृषि क्षेत्र में टेक्नोलोजी की उपयोगिता को दरकिनार नहीं किया जा सकता  इसलिए इसके साथ ही कदम से कदम मिलकर बढ़ना होगा.
आये दिन किसानों की आत्महत्या, सरकार की लचर-पचर नीतियां , बिचौलियापन, प्राकृतिक आपदाओं के कारन आज के युवा खेती-किसानी से दूर होते जा रहे हैं।  अगर यूं कहें की उनका मन खेती-किसानी की और नहीं जाता तो आश्चर्य की बात नहीं. इस खेती-किसानी से भली शहर पलायन कर रोज़ की दिहाड़ी कर जीवन -यापन  करना बेहतर उपाय समझते हैं।  पर हकीकत कुछ और बयान करती हैं वो युवा अपना घर बार छोड़ दो-जून की रोटी की खातिर अपनों से बेगाना होते हैं , शहर के ठेकेदार के चक्कर में पड़ कई बार जमा पूंजी भी गँवा देते हैं, कई गलत व्यसनों के आदि हो  अपना ही नुकसान कर लेते हैं।  ऐसे में सरकार अगर कृषि पर मौलिक बातों को  ध्यान में रख नयी तकनिकी युक्त योजनाएं बनाये और बिना किसी ढील के पारदर्शिता पूर्वक , अच्छी गुणवत्ता वाली मॉनिटरिंग सिस्टम का उपयोग कर नीतियों का क्रियान्वयन करे और तो निश्चित तौर पर कृषि की तरफ लोगों का आकर्षण बढ़ेगा।  भारत की उर्वरायुक्त भूमि में अच्छी उपज कर हम हरेक फसलों का निर्यात विदेशों में बहुतायत मात्रा में कर सकते हैं जिससे किसानों  की आमदनी अच्छी  होगी और कृषि भी अन्य रोज़गार की भांति लोगों द्वारा अपनाया जा सकेगा.

Important Links for Indian Farmers: 
१. https://www.india.gov.in/topics/agriculture
२. http://agricoop.nic.in/
३. https://www.enam.gov.in/

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