क्या ज़ुल्मतों के दौर में भी गीत गाए जाएंगे? हाँ, ज़ुल्मतों के दौर के ही गीत गाये जायेंगे ... पर सुर ज़रा संभाल के, क्योंकि यहाँ सुर बिगड़ते ही 'सिस्टम' का पारा चढ़ जाता है! ई हम नहीं कह रहे हैं, ई तो बर्तोल्त ब्रेख्त साहब बहुत पहले कह के चले गए। लेकिन अगर आज वो हमारे बिहार के किसी प्रखंड कार्यालय के बाहर खड़े होते, तो शायद अपनी कविता बदल देते। वो लिखते- "क्या भ्रष्टाचार के इस कलयुग में भी फाइलें आगे बढ़ाई जाएंगी? हाँ भाई, बढ़ाई तो जाएंगी, पर पहले 'चढ़ावे' की रसीद कटाई जाएगी!" आजकल अपने देश और विशेषकर बिहार में 'सरकार' और 'जनता' के बीच का रिश्ता बिल्कुल वैसा ही हो गया है जैसा एक कड़क ससुर और डरे हुए दामाद का होता है। दामाद जी (जनता) हाथ जोड़कर खड़े हैं कि हुज़ूर, ज़रा सा काम कर दीजिए, और ससुर जी (सर्च इंजन से तेज चलने वाला हमारा सरकारी सिस्टम) मुँह फुलाए बैठे हैं कि जब तक जेब ढीली नहीं होगी, फाइल टस से मस नहीं होगी। विश्वास का तो ऐसा 'सिस्टम क्रैश' हुआ है कि अब तो आम आदमी को भगवान पर भरोसा हो जाता है, पर ब्लॉक के बड़े बाबू के वादों पर ...
अक्सर हम जब भी स्पेस, एलियंस या मॉडर्न साइंस की बात करते हैं, तो हॉलीवुड फिल्मों की तरह न्यूयॉर्क की ऊंची इमारतें या वाशिंगटन की चमचमाती गलियां ही दिमाग में आती हैं। लेकिन क्या ब्रह्मांड के नियम इतने सीमित हैं? क्या किसी दूसरे ग्रह का शातिर एलियन न्यूयॉर्क के बजाय सीधे बिहार के जमुई जिले के किसी बैंगन के खेत में लैंड नहीं कर सकता? इसी अनोखे और बेबाक सवाल के जवाब से जनम हुआ है किताब- "ब्रह्मांड के फूफाजी: फ्रॉम जमुई टू जुपिटर" का । यह किताब असल में है क्या? A Desi Sci-Fi Satire: यह कोई आम साइंस-फिक्शन (Sci-Fi) कहानी नहीं है, बल्कि शुद्ध देसी मिजाज में लिपटा एक करारा सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य (Satire) है। यह कहानी खालिस 'बकैती' और 'जुगाड़' की है। अगर आप सोच रहे हैं कि इस किताब में क्या खास है, तो इसकी कुछ कड़क कड़ियां ये हैं: हर उम्र के पाठकों के लिए: चाहे स्कूल-कॉलेज जाने वाले बच्चे हों, युवा हों या घर के बुजुर्ग- यह किताब हर पीढ़ी के पाठक को अपनी रफ्तार और हास्य से बांधकर रखेगी। झबरू, मुखिया जी और चुलबुल की तिकड़ी: 'झबरू' कोई आम एलियन नहीं है। वह...