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ब्रह्मांड के फूफाजी: फ्रॉम जमुई टू जुपिटर (बुक ओवर-व्यू )

अक्सर हम जब भी स्पेस, एलियंस या मॉडर्न साइंस की बात करते हैं, तो हॉलीवुड फिल्मों की तरह न्यूयॉर्क की ऊंची इमारतें या वाशिंगटन की चमचमाती गलियां ही दिमाग में आती हैं। लेकिन क्या ब्रह्मांड के नियम इतने सीमित हैं? क्या किसी दूसरे ग्रह का शातिर एलियन न्यूयॉर्क के बजाय सीधे बिहार के जमुई जिले के किसी बैंगन के खेत में लैंड नहीं कर सकता? इसी अनोखे और बेबाक सवाल के जवाब से जनम हुआ है मेरी पहली किताब का -  "ब्रह्मांड के फूफाजी: फ्रॉम जमुई टू जुपिटर" । यह किताब अब आधिकारिक तौर पर छपकर लाइव हो चुकी है! यह किताब असल में है क्या? A Desi Sci-Fi Satire: यह कोई आम साइंस-फिक्शन (Sci-Fi) कहानी नहीं है, बल्कि शुद्ध देसी मिजाज में लिपटा एक करारा सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य (Satire) है। यह कहानी खालिस 'बकैती' और 'जुगाड़' की है।  अगर आप सोच रहे हैं कि इस किताब में क्या खास है, तो इसकी कुछ कड़क कड़ियां ये हैं: हर उम्र के पाठकों के लिए: चाहे स्कूल-कॉलेज जाने वाले बच्चे हों, युवा हों या घर के बुजुर्ग- यह किताब हर पीढ़ी के पाठक को अपनी रफ्तार और हास्य से बांधकर रखेगी।   झबरू, मुखिया जी औ...
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सितारों का कब्रिस्तान: क्या ब्रह्मांड वाकई हमसे बात कर रहा है?

अक्सर लोग कहते हैं कि इन चमकते सितारों की अपनी एक लिपि होती है। सच कहूँ तो- कितना मासूम और बेवकूफी भरा ख्याल है यह। रात के उस गहरे सियाह अंधेरे में, जिसे हम 'कायनात का बेपर्दा होना' कहते हैं, असल में वह सिर्फ एक खालीपन है- एक ऐसा वैक्यूम जो हमें हमारी औकात याद दिलाता है। प्रोफेसर माथुर अपनी जर्जर वेधशाला की खिड़की से उस अनंत कालेपन को घूर रहे थे। उनके पास खड़ा आर्यन, जिसकी आँखों में अब भी उम्मीद के कुछ कतरे बाकी थे, उत्साह से बोला- "सर! देखिए, ये तारे आसमां के सफ़हे पर एक खास तरतीब में सज गए हैं। शायद वो एक नज़्म लिख रहे हैं।" माथुर ने अपनी सिगरेट का धुंआ उस ठंडी हवा में उछाला और एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा- "नज़्म नहीं है यह आर्यन, यह ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और क्रूर मज़ाक है। ये तारे, जो तुम्हें सजे हुए दिखते हैं, दरअसल अरबों खरबों मील दूर जलती हुई गैस के ढेर हैं। उनका आपस में कोई रिश्ता नहीं है, न ही वे तुम्हारे लिए कोई संदेश लिख रहे हैं। हम इंसानों की पुरानी आदत है कि हम बेतरतीब चीज़ों में भी कोई मतलब ढूंढ लेते हैं, ताकि अपनी तन्हाई को सह सकें।हम इंसानों की यह फितर...

Ram and Hanuman: चैत्र मास में क्यों खास है स्वामी और सेवक का यह जन्मोत्सव ?

चैत्र महीना का यह अनुपम संयोग ही है कि जहाँ एकतरफ मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वहीँ दूसरी तरफ संकटमोचन  महावीर  भी हैं । हमारी भारतीय काल गणना के अनुसार चैत्र का महीना केवल नए संवत की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह भक्ति और शक्ति के मिलन का साक्षी भी है। चैत का महीना बड़ा ही पावन है। कहते हैं भगवान ब्रह्माजी ने इसी चैत महीने में कॉस्मॉस के क्रिएशन की शुरुआत की थी यानी कॉस्मॉस जिसमें स्टार्स, प्लेनेट और टाइम.. यानि सृष्टि आरम्भ ...  यह संयोग सच मे अद्भुत है कि जिस महीने में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने जन्म लिया, उसी महीने की पूर्णिमा को उनके सबसे प्रिय सेवक, संकटमोचन हनुमान जी का भी प्राकट्य हुआ। एक का 'नवमी', दूसरे का 'पूर्णिमा' चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथी को अयोध्या के राजभवन में राम लला का आगमन हुआ, तो ठीक छह दिन बाद पूर्णिमा के दिन केसरी नंदन हनुमान जी ने इस धरा पर अवतार लिया। एक तरफ वह तिथि है जब सूर्य अपनी उच्च राशि में होकर तपता है Ram Navmi, और दूसरी तरफ वह तिथि है जब चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ शीतलता प्रदान करता है (Hanuman Jayanti)। यह बतलाता ह...

मर्यादा बनाम मंच

आज एक महज़ संयोग ही है। एक तरफ राम नवमी है, उस मर्यादा पुरुषोत्तम का उत्सव जिसने हमें सीमाओं में रहकर जीना सिखाया। और दूसरी तरफ आज विश्व रंगमंच दिवस भी है, उस कला का जश्न जो हर सीमा को तोड़ने का दम रखती है। हम जैसे सिनिकल लोगों के लिए, यह जिंदगी अक्सर एक ऐसे ही नाटक जैसी लगती है जिसका डायरेक्टर गायब है और कलाकार बिना रिहर्सल के अपनी-अपनी लाइनें बोल रहे हैं। लेकिन शायद सार यही है। जीवन -मृत्यु पर लिखी एक मार्मिक कविता  -  मृत्यु  आँखों के दरवाजे जब आप बंद करके देखेंगे तो पाएंगे कि राम एक मामूली किरदार नहीं वो असल में 'किरदार' की पराकाष्ठा हैं। उन्होंने इस नश्वर जगत में अपनी भूमिका एक बेटे, भाई, पति और राजा की इतनी शिद्दत से या बोलें तो ऐसे लीन होकर निभाई कि आज के शॉर्ट-टर्म कमिटमेंट और कैजुअल एप्रोच वाले दौर में वह नामुमकिन सा लगता है। मज़े की बात यह है कि उन्होंने अपनी लाइफ की स्क्रिप्ट को तब भी पवित्र माना, जब कहानी में उनके साथ नाइंसाफी हुई। वहीं, रंगमंच हमें याद दिलाता है कि पूरी दुनिया एक स्टेज है। हमारा प्यार, गुस्सा, हमारा भक्ति भाव, यहाँ तक कि हमारा यह...

Love vs Logic: Valentine Special – प्रेम का ‘बार्टर सिस्टम’ या सच्चा समर्पण

  "एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे, और बदले में यूपी बिहार ले ले" गाने में उधार शब्द ऐसे ही उधार ले लिया होगा। बाकी उधार जैसा इसमें कुछ भी नहीं है। मतलब सीधा - एक चुम्मा दो और यूपी बिहार ले लो। नो उधारी, डायरेक्ट विनिमय - बार्टर सिस्टम। सरल समीकरण :  1 चुम्मा = यूपी + बिहार       गुलाबो का प्यार बार्टर सिस्टम एक ऐसी विनिमय (लेन-देन) प्रणाली है जिसमें आवश्यकताओं का दोहरा संयोग होता है। यानी आपको एक ऐसे व्यक्ति को ढूंढना होगा जिसके पास वह समान हो जो आपको चाहिए और उसे वह चाहिए जो आपके पास है। साफ-साफ शब्दों में समझें तो - दिल लेने की रुत आई, दिल देने की रुत आई। भई, आज के Gen-Z या कलयुगी प्यार के मूल में तो बार्टर सिस्टम ही है।  जैसे 'तुम मुझे रोज गुड मॉर्निंग भेजो ; मैं तुझे आई लव यू भेजूंगा! "  " मैं तुम्हारी फोटो पर कमेंट करूंगा ; तुम मेरी स्टोरी पर दिल वाला रिएक्शन दे दो !" इस तरह के Give & Take Pvt. Ltd. प्रेम वाला स्टार्टअप अब तो यूनिकॉर्न बनता जा रहा है। तत्कलीन समय में प्रेम सिर्फ देने का नाम नहीं रह गया है । यह एक द्विपक्षीय निवेश बन चुका ह...

डार्क डेज़ ऑफ डेमोक्रेसी - दी सिनिकल माइंड

विपक्ष को कुचलने.. देश की संवैधानिक व्यवस्था को ध्वस्त करने और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने की राजनीति करनेवाली वाली कांग्रेस सरकार की नींव तब हिल गई थी जब आज के ही दिन जेपी बाबा ने "सिंहासन खाली करो की जनता आती है" का उद्घोष किया.. इतिहास की कुछ तारीखें नहीं भूली जा सकती हैं और 25 जून 1975 उनमें से एक है..जब इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद के साथ मिलकर पूरे देश भर में आपातकाल की घोषणा की। जन-जीवन असामान्य हो गया । लोग अपने ही देश मे डर के साये में रहने लगे। लोगों को सरकार की आलोचना करने पर जेल में डाला जाने लगा। देश में चुनावों पर पाबंदी लगा दी गई। संविधान के द्वारा जनता को मिले मौलिक अधिकार समाप्त कर दिए गए।  अटल जी, आडवाणी जी सहित जनता पार्टी और जनसंघ के साथ कई अन्य पार्टी के दिग्गज नेताओं को जेल में डाल दिया गया। तब आज के प्रधानमंत्री श्री मोदीजी ने एक सिख का भेष धारण कर उस दौरान संघर्ष किया और संगठन के संदेशों का आदान-प्रदान बखूबी किया। चार दशक बाद भी देश गांधी परिवार के इस दंश नहीं भूला है.. आप भी इतिहास के इस काले दिन का अध्ययन कर ...

सेकुलरों की थोड़ी और चलती तो ये गणेश शंकर विद्यार्थी को भी 'भक्त' कह देते - दी सिनिकल माइंड

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी के अभी दो दिन भी नहीं बीते थे कि 25 मार्च 1931 को पूरे देश में हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच मनमुटाव ने एक बड़े दंगे का रूप ले लिया और कानपुर भी इससे अछूता नहीं रहा।  गाँधीवादी विचारधारा के अनुयायी जब गणेश को दंगों की जानकारी मिली तो वे अकेले ही एक खास समुदाय बहुल इलाके में दंगों को रोकने के लिए निकल पड़े किन्तु दंगों को रोकने के इस प्रयास का परिणाम हुआ उनकी हत्या। कानपुर के चौबे गोला चौराहे के पास चाकू घोंप कर गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ की हत्या कर दी गई। दरअसल गणेश शंकर गाँधीवादी विचारों एवं क्रांतिकारी व्यक्तित्व का सम्मिश्रण थे। उन्होंने कभी नहीं देखा कि जिसकी आलोचना वे कर रहे हैं, वह किस धर्म का है, किस वर्ग का है। अमीर है अथवा गरीब। जमींदार है या पूँजीपति। उनके लिए तो बस अन्याय, अन्याय था और अन्याय करने वाला दोषी। हिंदुओं के साथ-साथ विद्यार्थी जी ने मुस्लिम समुदाय को भी निशाने पर लिया. अपने लेख में वे कहते हैं, ‘ऐसे लोग जो टर्की, काबुल, मक्का या जेद्दा का सपना देखते हैं, वे भी इसी तरह की भूल कर रहे हैं. ये जगह उनकी जन्मभूमि नहीं है.’...

हैप्पी सरस्वती पूजा - दी सिनिकल माइंड

सुबह से माथा भारी लग रहा है.. लगता है बड़े टाइप ज्ञान का डाउनलोडिंग चल रहा है ..रैम अपनी स्टोरेज खो रहा है..डिस्क मेमोरी फुल होने के कगार पर है और एक्स्ट्रा हार्ड-डिस्क भी अनअवेलेबल है.. आज सुबह प्रियंका जी का ट्वीट देखा -कह रही हैं कि हर बसन्त-पंचमी उनकी मां दोनों भाई बहनों को पीले रुमाल के साथ एक पीला फूल देती हैं और ये प्रथा उनके दादी के समय से चलता आ रहा है .. इस बसंत-पंचमी ऐसे  गूढ़ रहस्य की खोज..क्या है न,  "मोदी है तो मुमकिन है " हे मां सरस्वती ! इस ओवर-लोडेड ज्ञान से छुटकारा दो और सबके इंटरनल-मेमोरी को ज़िंदा रहने लायक ज्ञान और प्यार से लबालब भर दो..  आप सबको #बसंतपंचमी की ढेर सारी शुभकामनाएं!  " सरोसती माता, बिद्या दाता " 🙏

रामहि केवल प्रेमु पियारा - दी सिनिकल माइंड

"रामहि केवल प्रेमु पिआरा! जानि लेऊ जो जान निहारा!!"                                                  ( रामचरितमानस ) तुलसीबाबा कहते हैं- रामजी को केवल प्रेम पसंद है, जो जानने वाला हो, जो जानना चाहते हो वह जान ले। मन मे निश्चल प्रेम नहीं है तो राम को न हम प्राप्त होंगे और न ही राम हमको... हमें अगर राम को प्राप्त करना है तो प्रेम को आधार बनाना होगा ... बजरंगबली की प्रेम-भक्ति ही उन्हें राम के निकट लाई। हृदय में प्रेम के सिवा कुछ भी नहीं था। दिल चीर के देख तेरा ही नाम होगा ..  लेकिन बजरंग-दल वालों के दिल में ज़रा भी प्रेम नहीं है.. दिल पत्थर का है..नारी से दूर भागता कोई सिद्ध है..ऐसा बिल्कुल भी नहीं हैं .. जाते तो ये भी हैं बागों में उसी जीवन की तलाश में ..पर बेचारे के Life में पहिला लेटर L सच में बड़ा है ..थोड़ा तरस खाओ उनपर भी ..प्रेम में राम नाम सत्य है इसका सबसे बड़ा कारण है कि अभी भी भारत का सेस्क-रेसियो बैलेंस्ड नहीं है. 2011 में हुए  सर्वे क...

राम रोज़ डे

स्वयम्वर में जब किसी से 'शिवजी का धनुष' नहीं टूटा तो राजा जनक की स्थिति ठीक उसी तरह हो गई थी जैसे एक मिडिल क्लास पप्पा का होता है। जो अपनी बेटी के लिए दिन-रात राम टाइप लईका ढूंढते रहते हैं .. आम लड़कियों की तरह सीता जी भी काफी समझदार थी और फ्यूचर कान्सेस भी। लइकन का क्या उसको तो अक्सर विश्वामित्र जैसे गुरु मिल ही जाते हैं जो अपने चेले को ताड़िका, सुबाहु और मारीच को मारने के लिए मोर्चे पर लगा देते हैं। लेकिन विश्वामित्र जैसे गुरु के मन मे भी यही इच्छा उठी की सीता जी का राम जी के संग सेटिंग हो जाये  और इस प्रकार एक दिन पहिले ही राम-सीता विवाह के 'खेल का दी एन्ड' हो चुका था। प्रेम का बीज बगीचे में ही लग गया था..एक झटके में ..देखा तुझे तो, हो गई दीवानी टाइप.. सीता जी सुबह-सुबह पूजा की थाल लिए दोनों तरफ़ लगे लाल-लाल गुलाबों की क्यारियों के बीच से गुज़र रही थी कि अचानक दूर खड़े डैशिंग राम नज़र आये.. और फिर क्या..लव एट फर्स्ट साइट..     गुलाबो का प्यार महाकवि तुलसीदास जी अपने   रामचरितमानस में कहते हैं कि -  सिय चकित चित रामहि चाहा, भये मोहबस सब नरनाहा । मुन...

हार्दिक, कन्हैया, जिग्नेश, शेहला जैसे फ्लॉप चेहरे के बाद अब बारी टिकैत की - दी सिनिकल माइंड

नेता वो होता है जिसका जनाधार हो, जो पलटी ना मारे, जिसका सार्वजनिक जीवन और चरित्र साफ हो। हमारे यहाँ हर साल-छः महीने में एक नया नेता पैदा लेता है जिसे देख लगता है कि अबकी बार ये बाजी पलट देगा लेकिन हकीकत इसके उलट है। 2015 में एकबारगी ऐसा लगा कि हार्दिक पटेल एक मज़बूत कम्युनिटी का मसीहा बन जाएगा...लेकिन क्या हुआ ? उसी तरह साल 2016 में JNU के बीहड़ों से निकले कन्हैया कुमार मज़दूरों और दबे-कुचलों के सारे दुख-दर्द दूर कर देगा ..लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात ।   लेकिन सिलसिला यहीं नही थमा और 2017 में गुजरात मे दंगे कराकर मशहूर हुए जिग्नेश मेवानी जिसे एक बारगी फिर दलितों के मसीहा के तरह देखा गया और लोग सोचने लगे कि अब दलित वोट कंसॉलिडेट हो जायेगे ..पर क्या ऐसा हुआ ? और फिर 2018 -19 में दो क्रांतिकारी नाम आये शेहला राशिद और शाह फैसल जिसे छात्रों और मुसलमानों का एक नया प्रतीक समझ गया ..लेकिन यह केवल प्रतीकात्मक ही रहा.. ये  दोनों भी अति महत्वाकांक्षा के चक्कर मे न घर के बचे न घाट के ... और पढ़ें -  काशी का अस्सी  हे ताड़िका ! हमें ताड़ो। हमें निहारो।।  भारतीय कृषि...