अक्सर लोग कहते हैं कि इन चमकते सितारों की अपनी एक लिपि होती है। सच कहूँ तो -कितना मासूम और बेवकूफी भरा ख्याल है यह। रात के उस गहरे सियाह अंधेरे में, जिसे हम 'कायनात का बेपर्दा होना' कहते हैं, असल में वह सिर्फ एक खालीपन है—एक ऐसा वैक्यूम जो हमें हमारी औकात याद दिलाता है। प्रोफेसर माथुर अपनी जर्जर वेधशाला (Observatory) की खिड़की से उस अनंत कालेपन को घूर रहे थे। उनके पास खड़ा आर्यन, जिसकी आँखों में अब भी उम्मीद के कुछ कतरे बाकी थे, उत्साह से बोला— "सर! देखिए, ये तारे आसमां के सफ़हे पर एक खास तरतीब में सज गए हैं। शायद वो एक नज़्म लिख रहे हैं।" माथुर ने अपनी सिगरेट का धुंआ उस ठंडी हवा में उछाला और एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा— "नज़्म नहीं है यह आर्यन, यह ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और क्रूर 'विज्ञापन' है। ये तारे, जो तुम्हें सजे हुए दिखते हैं, दरअसल अरबों खरबों मील दूर जलती हुई गैस के ढेर हैं। उनका आपस में कोई रिश्ता नहीं है, न ही वे तुम्हारे लिए कोई संदेश लिख रहे हैं। हम इंसानों की पुरानी आदत है कि हम बेतरतीब चीज़ों में भी कोई मतलब ढूंढ लेते हैं, ताकि अपनी तन्हाई को सह...
चैत्र महीना का यह अनुपम संयोग ही है कि जहाँ एकतरफ मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वहीँ दूसरी तरफ संकटमोचन महावीर भी हैं । हमारी भारतीय काल गणना के अनुसार चैत्र का महीना केवल नए संवत की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह भक्ति और शक्ति के मिलन का साक्षी भी है। चैत का महीना बड़ा ही पावन है। कहते हैं भगवान ब्रह्माजी ने इसी चैत महीने में कॉस्मॉस के क्रिएशन की शुरुआत की थी यानी कॉस्मॉस जिसमें स्टार्स, प्लेनेट और टाइम.. यानि सृष्टि आरम्भ ... यह संयोग सच मे अद्भुत है कि जिस महीने में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने जन्म लिया, उसी महीने की पूर्णिमा को उनके सबसे प्रिय सेवक, संकटमोचन हनुमान जी का भी प्राकट्य हुआ। एक का 'नवमी', दूसरे का 'पूर्णिमा' चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथी को अयोध्या के राजभवन में राम लला का आगमन हुआ, तो ठीक छह दिन बाद पूर्णिमा के दिन केसरी नंदन हनुमान जी ने इस धरा पर अवतार लिया। एक तरफ वह तिथि है जब सूर्य अपनी उच्च राशि में होकर तपता है Ram Navmi, और दूसरी तरफ वह तिथि है जब चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ शीतलता प्रदान करता है (Hanuman Jayanti)। यह बतलाता ह...