अक्सर लोग कहते हैं कि इन चमकते सितारों की अपनी एक लिपि होती है। सच कहूँ तो- कितना मासूम और बेवकूफी भरा ख्याल है यह। रात के उस गहरे सियाह अंधेरे में, जिसे हम 'कायनात का बेपर्दा होना' कहते हैं, असल में वह सिर्फ एक खालीपन है- एक ऐसा वैक्यूम जो हमें हमारी औकात याद दिलाता है।
प्रोफेसर माथुर अपनी जर्जर वेधशाला की खिड़की से उस अनंत कालेपन को घूर रहे थे। उनके पास खड़ा आर्यन, जिसकी आँखों में अब भी उम्मीद के कुछ कतरे बाकी थे, उत्साह से बोला- "सर! देखिए, ये तारे आसमां के सफ़हे पर एक खास तरतीब में सज गए हैं। शायद वो एक नज़्म लिख रहे हैं।"
माथुर ने अपनी सिगरेट का धुंआ उस ठंडी हवा में उछाला और एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा- "नज़्म नहीं है यह आर्यन, यह ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और क्रूर मज़ाक है। ये तारे, जो तुम्हें सजे हुए दिखते हैं, दरअसल अरबों खरबों मील दूर जलती हुई गैस के ढेर हैं। उनका आपस में कोई रिश्ता नहीं है, न ही वे तुम्हारे लिए कोई संदेश लिख रहे हैं। हम इंसानों की पुरानी आदत है कि हम बेतरतीब चीज़ों में भी कोई मतलब ढूंढ लेते हैं, ताकि अपनी तन्हाई को सह सकें।हम इंसानों की यह फितरत है कि हम शांति में भी संगीत ढूंढ लेते हैं।"
तभी समर, जो अपने लैपटॉप पर 'कॉस्मिक नॉइज़' को डिकोड कर रहा था, बीच में ही बोल पड़ा- "सर, डेटा तो यही कह रहा है कि जिसे आर्यन 'संगीत' समझ रहा है, वह सिर्फ एक 'सिस्टम एरर' है। मरे हुए तारे कभी कविता नहीं सुनाते।"
माथुर खामोश हो गए। उन्होंने अपनी डायरी उठाई और उस पर एक बड़ा सा 'शून्य' बना दिया। उन्होंने महसूस किया कि हम जिसे 'आसमान की इबादत' कहते हैं, वह दरअसल हमारे अपने ही अधूरेपन का एक 'रिफ्लेक्शन' है। सितारों का कोई दिल नहीं होता, उनकी कोई संवेदना नहीं होती। वे बस जल रहे हैं क्योंकि वे जल सकते हैं।
जो शब्द, जो दर्शन और प्रोफेसर माथुर, समर और आर्यन की जिस अधूरी खोज का सिंटैक्स आपने ऊपर पढ़ा... वह महज़ एक ब्लॉग पोस्ट नहीं थी। यह तो हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली बार लिखे 'टेक्नो-फिलोसोफिकल' ब्रह्मांड की पहली दस्तक थी!
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