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काशी का अस्सी (किताब) - रिव्यू

सबसे खूबसूरत भाषा वो होती है जो रोज़ बोल चाल में इसतेमाल हो और यही भाषा का मानवीय रूप भी होता है। काशीनाथ सिंह ने इसी भाषा को उठाया है और लिख डाला है ' काशी का अस्सी ' । इस भाषा के साथ है बनारस खासकर अस्सी . वो बनारस जो भारतीय संसकृति की गंगोत्री है। वो बनारस जिसकी फ़ितरत आज़ादी, मौज और बेफिकरी है। ये किताब बनारस की संस्कृति और समय के साथ होते उसके बदलाव के बारे में है। अस्सी किताब का हीरो है और ग्लोबलाइजेशन विलेन , जिससे अस्सी बचना चाहता है। वैसे तो,  जीत ग्लोबलाइजेशन की होती है लेकिन अस्सी हारता नहीं है। Kashi Ka Assi -Book Review 90 के दौर की राजनीति और भारत को जानने के लिए शायद ही इससे बेहतर और मज़ेदार किताब कोई और हो।  अस्सी को मूल में रखते हुए भारत की राजनीति व इसके सामाजिक व्यवस्था पर बेबाकी से बखिया उधेड़ते काशीनाथ सिंह इस किताब में कहते हैं - "  भ्रष्टाचार लोकतंत्र के लिए ऑक्सीजन है, है कोई ऐसा राष्ट्र जहाँ लोकतंत्र हो भ्रष्टाचार न हो ? जरा नज़र दौड़ाइए पूरी दुनिया पर , ये छोटी बड़ी राजनितिक पार्टियां क्या हैं ? अलग- अलग छोटे - बड़े संसथान , भ्रष्ट...

आजाद भारत की सबसे बड़ी चुनौती

आज़ादी के ७२ वर्ष पूरे हो चुके हैं . यह गौरव की बात होनी चाहिए और वस्तुतः है भी . पर एक बारगी आप अपने चारों तरफ नज़र उठाकर देख लें तो निराशा , नकारात्मकता ,अविश्वास जैसी ही चीजें दिखाई देती हैं. कहीं भूख है तो कहीं भूख के नाम पर दंगे हैं , एक अनकही प्यास पर खून की नदियाँ पाटी जा रही हैं , प्यार है पर प्यार का रस लूटा जा रहां है  , छूटा जा रहा है. लेकिन हम उसी जोशो-रोश से यह आज़ादी भी मना रहे हैं . हम कई मामलों में बढ़ रहे हैं और कईयों में तो कई गुना बढ़ोतरी कर ली . वैश्विक पटल पर लोगो के बीच हमारी स्थिति भी अच्छी है. पर कुछ बातें है जिसपर हमारी नज़र जानी चाहिए .  हम आजादी के ७३वां वर्षगाँठ  मना रहे हैं लेकिन हमारे सामने कई सारी चुनौतियाँ सुरसा की भांति मुँह बाए खड़ी  है. Challanges & Threats to Indpendent India: Where-to-be-born Index के  अनुसार,  जिसके मुख्य आधार हैं  Material well-being , Life expectancy, political freedoms, Job security & unemployment rate,Climate ,Governance (measured by ratings for corruption) में  भारत का स्थान 80 ...

दोस्तों को नाग पंचमी की शुभकामना !

तुम तकल्लुफ को भी इखलास समझते हो 'फ़राज़' दोस्त  होता  नहीं   हर   हाथ  मिलाने   वाला  || अहमद फ़राज़ की इन बातों से ज़ाहिर होता है की इनके दोस्तों ने इनका बहुत काटा है . काटने के कई तरीके होते हैं कुत्तों वाला काटना , साँपों वाला काटना .. .. .. आदि भिन्न -भिन्न प्रकार के काटने-काटने के वर्णन है दोस्ती के इतिहास में . इसका तो आपको पता ही है क्योंकि आप भी दोस्त हैं .  #TheCynicalMind पर कुछ अलग है दोस्तों वाला काटना . दोस्तों से कटने में न आदमी मरता है और न ही जी पाता है .  दोस्तों के काटने की गहराई ठीक वैसी ही है जितनी कि  कसी ने  पिएनबी का  काटा , मोदी ने आडवानी का काटा , केजरू  ने हजारे का काटा , कोंग्रेस के इसके दुलारे ने काटा . इन गहराई  का पता लगाना ब्लैक होल   की आधी अधूरी सच्चाई का पता लगाने के माफिक है, बीडू ! इसी काटने के क्रम में दोस्तों द्वारा  साँपों के माफिक काटने की बात इस साल जग जाहिर हो गयी . इसबार तो फ्रेंडशिप डे भी नागपंचमी के साथ मनाया जा रहा है . दोस्तो...

बिहार की अंधी सरकार के निकम्मेपन का नाम है चमकी बुखार

बिहार और चमकी बुखार का नाता थोड़ा पुराना है.  लेकिन एक और बात है जिसे आप भी अंगीकार करेंगे कि बिहार की अंधी सरकार के निकम्मेपन का नाम है चमकी बुखार (Chamaki Bukhar is a name of Bihar Govt's Insipidness). कठोपनिषद के नचिकेता-यमराज संवाद में आज नचिकेता (प्रश्न करेवाला ) खेल से गायब हो चुका है . अब वह प्रेत बन चुका है अगर नागार्जुन की माने तो। उनकी कविता 'प्रेत का बयान'' का एक अंश  है.. "ओ रे प्रेत -" कडककर बोले नरक के मालिक यमराज  -"सच - सच बतला ! कैसे मरा तू ? भूख से , अकाल से ? बुखार कालाजार से ?...  अगर बाबा नागार्जुन की जगह मैं होता तो कहता , " महाराज ! सच - सच कहूँगा  झूठ नहीं बोलूँगा  नागरिक हैं हम स्वाधीन भारत के  मुजफ्फरपुर  जिला है , सूबा बिहार में ...  ( पूरी  कविता यहां पढ़ें ) जी हाँ , १२० बच्चों को,  सरकारी आंकड़ों के अनुसार फिर से मृतक की फेहरिश्तों में सजा दिए जायेंगे।  लेकिन क्या बात यहीं तक रूकती है ? ऐसे कई आंकड़ें हैं चमकी की , भारत खासकर बिहार के ...

हम फादर्स डे क्यों मनाते हैं ?

हम फादर्स डे क्यों मनाते हैं (Why do we celebrate Fathers'Day) ? वास्तव में यह अजीब सा प्रश्न है की हम Father's Day  अर्थात पिता दिवस क्यों मनाते हैं ? शुरू करते हैं पुराणों से, पुराण मतलब पुराना अर्थात जो बीत चुका  है लेकिंन अंग्रेजी के शब्द हिस्ट्री (History ) से यह  थोड़ा सा भिन्न है। जीवन का आविर्भाव युग्मों से होता है यानि की दो के मिलन से होता है। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि दो जीवों के आनंद के चरमोत्कर्ष  की प्रक्रिया ही नए जीवों का प्रतिपादन करते हैं.  हमारे अपने होने का भी श्रेय दो को ही जाता है जिसे हम आमतौर पर माता-पिता की संज्ञा देते हैं। माँ की महिमा का गुणगान चहुओर है पर पिता के बारे में  स्कंन्द पुराण के छठे अध्याय में लिखा है पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता परमकं तपः |  पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवताः || ''अर्थात , पिता ही स्वर्ग है , पिता ही धर्म और सबसे बडा तप है।  अगर पिता खुश है तो ईश्वर भी प्रसन्न होते हैं।" चलिए ये तो पुरानों में लिखा है जिसका हमें-आपको तनिक भी पता नहीं है...

इतिहास के नज़र में जम्मू-कश्मीर और उसका जम्हूरियत

  ‘ जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत ’   अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा गिया गया यह मंत्र अक्सर ही कश्मीर में तथा कश्मीर से सम्बंधित बाटन में अक्सर अलापा जाता है और एक उदाहरण, “हिन्दू बहुल गाँव ने मुस्लिम शख्स को चुना पञ्च‘ विगत दिनों के पंचायत चुनावों में भद्रवाह शहर के एक हिन्दू बहुल गांव में जिसमे लगभग ४५० परिवारों में सिर्फ परिवार मुस्लिम है उस परिवार के चौधरी मोहम्मद हुसैन (५४ ) को निर्विरोध अपना पञ्च चुन लिया“ को कश्मीर की जमीनी सच्चाई बनाकर पेश किया जाता है . लेकिन हक़ीक़त क्या है? क्या जम्मू कश्मीर का इतिहास भी वही है जो आजकल के बड़बोले एलिट क्लास अक्सर पात्र-पत्रिकाओं , टीवी के चर्चाओं में करते हैं ? धरती का स्वर्ग , इंसानियत का दोज़ख़ (नर्क) बन चूका जम्मू -कश्मीर का एक ऐतिहासिक नजरिया भी है आइये उसको उसी के चश्मे से देखने का कोशिश करते हैं।     इन्टरनेट के जन्मदाता टीम बर्नर्स ली ने किया चौकाने वाला ऐलान historical view of ammu-Kashmir- and its democracy इतिहास के नज़र में जम्मू-कश्मीर और उसका जम्हूरियत    बात जम्हूरियत (De...

नेहरू पटेल की इस कहानी में छुपा है स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी पर सवाल उठाने वालों के जवाब

बात 2014 के आम लोकसभा चुनाव के पहले की है जब देश में एक अलग बयार चली थी। यह महज सिर्फ एक हवा का झोंका मात्र नहीं था वरन इसने एक झंझवात का रूप लिया जिससे कई दशकों की बनी बनाई एक मजबूत इमारत को गिरा दिया। और सबसे मज़े की बात यह थी कि इस इमारत के गिरते ही देश मे चहुओर एक अलग सी प्रकाश दिखाई दी। एक नई आशा की किरण ने देश हर वर्गों के लोगों में उत्साह और खुशियां भर दी। कई लोगों ने तो इसकी तुलना आज़ादी के वक़्त मिली चैन-सुकून से कर दी, बात भी कुछ हद तक सही ही थी। आज की बात इसी चुनावी बयार में चली एक संकल्प की करंगे जो आज चार साल बाद फिर सुर्खियों में है। बात है 'स्टेच्यू ऑफ यूनिटी' की। जिस ' स्टेच्यू ऑफ यूनिटी ' का बखान करते मीडिया और देश के  लोग अघाते नहीं थे, जिसकी तुलना अमेरिका के स्टेच्यु ऑफ लिबर्टी से भी कई अर्थों में हुई ।इतना ही नही इसे भारत के एक अप्रतिम  मिसाल के तौर पर देखा जा रहा था।  पर ऐसा क्या हुआ कि जिस प्रतिमा को भारत के गौरवपूर्ण इतिहास का नवीनतम उदाहरण  समझा गया था वही आज निंदा का कारण बन गया और ऐसी निंदा भारत की संस्कृति में कहाँ तक उचित है? क्या है...

राखीगढ़ी की खुदाई से लगा आरएसएस और हिंदुत्व को बड़ा झटका

हिन्दुस्तान के कई नामों में से एक नाम आर्यावर्त भी है। आर्यावर्त का शाब्दिक अर्थ पृथ्वी के एक ऐसे भूभाग से है जो आर्य लोगों से जुड़ा हो। वर्तमान में ये भूभाग सिर्फ भारत ही है जबकि आजादी से पहले का सम्पूर्ण भारतवर्ष आर्यप्रदेश के नाम से जाना जाता था। चाहे वह पाकिस्तान हो या बांग्लादेश आदि। इतिहासविदों की माने तो आर्य भारत के मूल निवासी नही थे। इतिहासविदों की माने तो आर्य भारत के मूल निवासी नही थे। हरियाणा के हिसार   जिले में स्थित राखीगढ़ी से मिला ४५०० वर्ष पुराना नर कंकाल  आर्य पोलैंड से इंडोनेशिया तक रहनेवाले एक खानाबदोश समुदाय से संबंधित है जो समयकाल में भारत के उत्तरी भाग में सबसे पहले प्रवेश किये और धीरे धीरे पूर्वी और पशिमी भागों में फैले और अपने आप को विकसित किया। इसी सभयता के दो प्रमुख नगर हुए जिसके समाप्ति की कहानी बड़ी रहस्यमयी है। आजतक इतिहासविद इसके नष्ट होने में कोई एक ठोस या मान्य निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए हैं यानी यूं कहें कि इतिहासकारों के मत में भिन्नता है। चाहे जो भी हो पर यह सत्य है कि रेडियोकार्बन  c14  जैसी नवीन विश्लेषण-पद्धति के अन...