सबसे खूबसूरत भाषा वो होती है जो रोज़ बोल चाल में इसतेमाल हो और यही भाषा का मानवीय रूप भी होता है। काशीनाथ सिंह ने इसी भाषा को उठाया है और लिख डाला है ' काशी का अस्सी ' । इस भाषा के साथ है बनारस खासकर अस्सी . वो बनारस जो भारतीय संसकृति की गंगोत्री है। वो बनारस जिसकी फ़ितरत आज़ादी, मौज और बेफिकरी है। ये किताब बनारस की संस्कृति और समय के साथ होते उसके बदलाव के बारे में है। अस्सी किताब का हीरो है और ग्लोबलाइजेशन विलेन , जिससे अस्सी बचना चाहता है। वैसे तो, जीत ग्लोबलाइजेशन की होती है लेकिन अस्सी हारता नहीं है। Kashi Ka Assi -Book Review 90 के दौर की राजनीति और भारत को जानने के लिए शायद ही इससे बेहतर और मज़ेदार किताब कोई और हो। अस्सी को मूल में रखते हुए भारत की राजनीति व इसके सामाजिक व्यवस्था पर बेबाकी से बखिया उधेड़ते काशीनाथ सिंह इस किताब में कहते हैं - " भ्रष्टाचार लोकतंत्र के लिए ऑक्सीजन है, है कोई ऐसा राष्ट्र जहाँ लोकतंत्र हो भ्रष्टाचार न हो ? जरा नज़र दौड़ाइए पूरी दुनिया पर , ये छोटी बड़ी राजनितिक पार्टियां क्या हैं ? अलग- अलग छोटे - बड़े संसथान , भ्रष्ट...