बात 2014 के आम लोकसभा चुनाव के पहले की है जब देश में एक अलग बयार चली थी। यह महज सिर्फ एक हवा का झोंका मात्र नहीं था वरन इसने एक झंझवात का रूप लिया जिससे कई दशकों की बनी बनाई एक मजबूत इमारत को गिरा दिया। और सबसे मज़े की बात यह थी कि इस इमारत के गिरते ही देश मे चहुओर एक अलग सी प्रकाश दिखाई दी। एक नई आशा की किरण ने देश हर वर्गों के लोगों में उत्साह और खुशियां भर दी। कई लोगों ने तो इसकी तुलना आज़ादी के वक़्त मिली चैन-सुकून से कर दी, बात भी कुछ हद तक सही ही थी। आज की बात इसी चुनावी बयार में चली एक संकल्प की करंगे जो आज चार साल बाद फिर सुर्खियों में है। बात है 'स्टेच्यू ऑफ यूनिटी' की। जिस ' स्टेच्यू ऑफ यूनिटी ' का बखान करते मीडिया और देश के लोग अघाते नहीं थे, जिसकी तुलना अमेरिका के स्टेच्यु ऑफ लिबर्टी से भी कई अर्थों में हुई ।इतना ही नही इसे भारत के एक अप्रतिम मिसाल के तौर पर देखा जा रहा था। पर ऐसा क्या हुआ कि जिस प्रतिमा को भारत के गौरवपूर्ण इतिहास का नवीनतम उदाहरण समझा गया था वही आज निंदा का कारण बन गया और ऐसी निंदा भारत की संस्कृति में कहाँ तक उचित है? क्या है...