क्या ज़ुल्मतों के दौर में भी गीत गाए जाएंगे? हाँ, ज़ुल्मतों के दौर के ही गीत गाये जायेंगे... पर सुर ज़रा संभाल के, क्योंकि यहाँ सुर बिगड़ते ही 'सिस्टम' का पारा चढ़ जाता है! ई हम नहीं कह रहे हैं, ई तो बर्तोल्त ब्रेख्त साहब बहुत पहले कह के चले गए। लेकिन अगर आज वो हमारे बिहार के किसी प्रखंड कार्यालय के बाहर खड़े होते, तो शायद अपनी कविता बदल देते। वो लिखते- "क्या भ्रष्टाचार के इस कलयुग में भी फाइलें आगे बढ़ाई जाएंगी? हाँ भाई, बढ़ाई तो जाएंगी, पर पहले 'चढ़ावे' की रसीद कटाई जाएगी!"
आजकल अपने देश और विशेषकर बिहार में 'सरकार' और 'जनता' के बीच का रिश्ता बिल्कुल वैसा ही हो गया है जैसा एक कड़क ससुर और डरे हुए दामाद का होता है। दामाद जी (जनता) हाथ जोड़कर खड़े हैं कि हुज़ूर, ज़रा सा काम कर दीजिए, और ससुर जी (सर्च इंजन से तेज चलने वाला हमारा सरकारी सिस्टम) मुँह फुलाए बैठे हैं कि जब तक जेब ढीली नहीं होगी, फाइल टस से मस नहीं होगी। विश्वास का तो ऐसा 'सिस्टम क्रैश' हुआ है कि अब तो आम आदमी को भगवान पर भरोसा हो जाता है, पर ब्लॉक के बड़े बाबू के वादों पर नहीं होता।
इसी व्यवस्था के बीच जब कोई भरत भूषण तिवारी जैसा नौजवान अपनी रीढ़ सीधी करके, सीना तानकर खड़ा होता है, तो सिस्टम को बड़ी खुजली होती है। जब आप सच का 'लाइव' चलाने लगते हैं, तो खाकी बूटों की आहट और बंदूकों की नालें आपकी तरफ मुड़ जाती हैं। हमारे यहाँ नियम बड़ा सिंपल है बाबू- या तो लाइन में लगकर अपनी चप्पल घिसिए, या फिर सच बोलने की जुर्रत में अपनी किस्मत को दांव पर लगाइए।
लेकिन रुकिए! इस दुर्दशा पर सिर्फ रोना ही थोड़े न है। जब व्यवस्था इतनी अजीब हो जाए कि आम आदमी की फरियाद किसी दूसरे ग्रह की भाषा लगने लगे, तो इसी अतरंगी व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाने के लिए बाज़ार में आ चुकी है व्यंग्य और सटायर से भरपूर नई किताब 'ब्रह्मांड के फूफाजी: फ्रॉम जमुई टू ज्यूपिटर'। आज के हालात ऐसे हैं कि अगर इस किताब के मुख्य पात्र यानी कोई हरा-भला एलियन भी अंतरिक्ष से उतरकर बिहार के प्रखंड कार्यालय में आ जाए और सोचे कि 'लाओ भाई, अपना यूएफओ रजिस्टर करवा लें', तो बड़े बाबू उसे भी तीन चक्कर कटवा देंगे- "पहले जाओ, अपने ग्रह का निवास प्रमाण पत्र लाओ, और हाँ, इस पर वहां के मुखिया जी का दस्तखत होना चाहिए!" सरकारी बाबुओं की ऐसी टेढ़ी चाल देखकर उस बेचारे परग्रही जीव को भी यहाँ चक्कर काटते-काटते अपनी चप्पलें घिसनी पड़ जाएंगी। अंत में वो एलियन भी अपना दो एंटीना पकड़कर रोने लगेगा कि 'ई किस गोला पर आ गए भाई, इससे बढ़िया तो हमारा वैक्यूम ही था।' अगर आप भी इस कमाल के राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य का मज़ा लेना चाहते हैं, तो यह शानदार किताब अब अमेज़न (Amazon) पर पढ़ने के लिए उपलब्ध है।
भ्रष्टाचार और अविश्वास के इस घने कुहासे में जब तक हम इस कड़वे सच को हंसी के तड़के के साथ नहीं परोसेंगे, तब तक लोग जागेंगे कैसे? सरकारें आती-जाती रहेंगी, कुर्सियों के रंग बदलते रहेंगे, लेकिन जब तक जनता का यह अविश्वास और व्यवस्था का यह क्रूर मज़ाक ख़त्म नहीं होता, तब तक ज़ुल्मतों के दौर में ऐसे तीखे गीत, ऐसी किताबें और भरत तिवारी जैसे किरदार बार-बार सामने आते रहेंगे।
बाकी, बड़े बाबू कुर्सी पर बैठे हैं, जनता कतार में है, और हम और आप इस पूरे तमाशे को देख रहे हैं। अब देखना यह है कि अगला 'सिस्टम क्रैश' कब और कहाँ होता है!
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