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Showing posts from October, 2019

पूंजीवाद का पर्स

आखिरकार प्रधान सेवक  के भतीजी की चोरी हुई बैग मिल गयी। इस खतरनाक आपरेशन को दिल्ली के 700 जवानों द्वारा 24 घंटे के भीतर सम्पन्न किया गया। वैसे,  महीने दिन पहले भीड़-भाड़ वाले इलाके CP में गनपॉइंट पर सामान लूट लिए गए लेकिन FIR वाली फ़ाइल दूसरी टेबल पर नहीं पहुंच पाई, दो साल से ऊपर हो गए नजीब को JNU से गायब हुए और कहानी ठंडे बस्ते में , सिर्फ दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में छोटे-मासूम बच्चों के अपहरण (किडनी गैंग) का अगर डेटा देखेंगे तो दिमाग झन्ना जाएगा । फेहरिश्त लंबी है ऐसी कहानियों की जिन्होंने बिना उपचार के ही दम तोड़ दी। लेकिन  PM के समबन्धियों का सामान सही सलामत वापिस आ गया इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात क्या हो सकती ै। ये पर्स वाला मामला भले नया हो लेकिन इतिहास में थोड़ा पीछे जाएं तो ये आपको और चौकायेगा। ऐसी कई घटनाएं हुयी जिसमे समाज और सामाजिक व्यवस्था को दरकिनार करते हुए एक खास लोगों पर केंद्रित रही और यह अनवरत है।  ये ख़ास लोग अपनी सुख -सुविधाओं के अनुसार कानून बनाते है और समय समय पर इसमें परिवर्तन भी। रोमन साम्राज्य को अगर आप पढ़ेंगे तो जानेंगे की एक र...

बेरोजगारी और हम

ओल्ड जेएनयु   का केरला कैफे   दिन में धूप सेंकने और शाम में लकड़ियों को ताड़ने का महत्वपूर्ण केंद्र  है।  आज जेएनयू  भले ही बदनामी का दंश झेल रहा है लेकिन यह  विश्व में आर्ट एंड कल्चर की पढाई में एक खास स्थान रखता है और इसी के चारदीवारी से सटा एक छोटी सी जगह है बेर सराय। यहां इंजीनियर्स कौड़ी के भाव में इधर -उधर भटकते पाए जाते हैं . कुकुरमुत्ते की तरह खुले इंजीनियरिंग कॉलेज और बेरोजगारी ने बेर सराय   की पापुलेशन डेंसिटी इतनी बढ़ा दी है कि आज यह ईस्ट एशिया का मकाऊ हो चला है। यकीन मानिये अगर नौसिखिये निशानेबाज भी एक ढेला उठाकर मारें तो दो -चार इंजीनियर सिगरेट पीते-पीते ही अपनी शहादत दे देंगे। पर कोई ढेला नहीं मारता हमें , हमारी स्थिति देखकर।  हमारी स्थिति मनरेगा के मज़दूर से भी बदत्तर है। यह तंज़ नहीं साब , हकीकत है और तभी हम गुनगुनाते हैं - " सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं दिल पे रख कर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है||" ऐसा लगता है की अदम गोंडवी ने यह पक्ति हमारे लिए ही लिखी हो। भारत में आज बेरोजगारी निम्नत...

हे ताड़िका ! हमें ताड़ो। हमें निहारो।।

दशहरा का मेला भी अब पहिले जैसा मनसाइन नहीं रहा। जलेबी और छोले-चाट से पूरा मेला गमकता था। ऊपर से चटकारा वाला गोलगप्पा दिमाग ऐसे झनझना था जैसे कि चच्चा ने नोटबन्दी का ऐलान कर दिया हो। खटाई और मिर्ची ठीक उसी तरह लगती थी जैसे कि सरकारी वादे के साथ सर्जिकल स्ट्राइक। फिर भी, फौजी के माफिक कोसों मार्च कर मेला में धंगड़मस्ती करते हुए अपने दोस्तों के साथ दूसरी टोली के गुब्बारे को ऐसे सुई घुसाते थे जैसे कि दुर्गा माता ने भाला फेंककर शुंभ की छाती विदीर्ण की थी।  बहुत मज़ा होता था। खुले आसमान के बादशाह होते थे।  लेकिन दोस्त अब शादीशुदा हो गए हैं और अपने विक्रम लैंडर के साथ ही छोटे छोटे उपग्रह को लिए मेले का चक्कर काट रहे हैं ; और हम राहुल गांधी टाइप ठलवागिरी। #TheCynicalMind  अब गाँव जाकर भी करते तो क्या करते? जो बचे थे, इसबार वो भी निपट लिए और ससुराल में राम जी टाइप वाला आदर-सत्कार पा रहे हैं । उधर ससुराल वाले भी अलग ही मूड में ,कि  बेटा करलो मौज मस्ती लड़ना तो रावण से ही है। अब  लड़ो, कटो, मरो ;हमने अपना पीछा छुड़ा लिया।   राम जी ने तो दस सि...