लगातार सात दिन चले, बाबा वैलेंटाइन का त्यौहार इस बार भी ख़तम हो गया. गुलाब की आशा पाले ठलवे अपने पैरों में काँटों का दर्द लिए दारु और चखने के साथ वापिस बैक टू पबिलियन हो चुके हैं. कईयों का मानना है कि मोदी जी के 'बेटी पढाओ, बेटी बचाओ' आन्दोलन को उनके होने वाले सास ससुर ने गंभीरता पूर्वक नहीं लिया नहीं तो उनको ये दिन देखना नहीं पड़ता . उनके साथ भी उनकी गुलाबो होती. खैर गुलाबो तो मिली पर फिल्म 'मटरू की बिजली का मनडोला' में जो पंकज कपूर को मिली थी, वो वाली . गुलाबो के नशे में चूर भैया के पाँव तो लडखडा रहे थे लेकिन आवाज़ में उतना ही जोश था , हौसले अब भी बुलंद थे . यकीन मानिये, भारत सरकार भैया को अगर बॉर्डर पर भेज देते तो बार्डर पार के लोगों का पैंट गीला कर आते. Gulabo Ka Pyar ऐसी बात नहीं है कि भैया दौड़ नहीं लगाए थे . मैट्रिक की परीक्षा पास करते ही भैया भोरे-भोरे नद्दी किनारे रोजीना तीन चक्कर मारते थे जैसे गणेश जी अपने पप्पा-मम्मी का चक्कर लगाये थे . खूब पसीना बहाए लेकिन उसी के साथ उनका नौकरी पाने का लक भी बह गया. लेट लतीफे वाली स...